Shiv Mahapuran के अध्याय 1 का सरल सार, कथा, महत्व और मुख्य शिक्षाएँ जानें। अध्याय 1 में ब्रह्मांड की उत्पत्ति, शिव तत्त्व और सृष्टि के रहस्यों का विस्तार मिलता है। पूरी जानकारी हिंदी में।
शौनकजी के साधनविषयक प्रश्न करने पर सूतजी का उन्हें शिवमहापुराण की महिमा सुनाना
श्रीशौनकजी बोले-हे महाज्ञानी सूतजी । सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता हे प्रभो! मुझसे पुराणोंकी कथाओंके सारत्तवका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये॥ १ I सदाचार, भगवद्धक्ति और विवेककी वृद्धि कैसे होती है तथा साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम-क्रोध आदि मानसिक विकारोंका निवारण करते हैं ? २I इस घोर कलियुगमें जीव प्रायः: आसुर स्वभावके हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध (दैवी सम्पत्तसे युक्त) बनानेके लिये सर्वश्रष्ठ उपाय क्या है ? ३ आप इस समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन ब्रताइये, जो कल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट एवं परम मंगलकारी हो तथा पवित्र करनेवाले उपायोंमें भी सर्वोत्तम पवित्रकारक उपाय हो ॥४ तात! वह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे शीष्र ही अन्तःकरणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा उससे निर्मल चित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवकी प्राप्ति हो जाय ५॥
सूतजी बोले- मुनिश्रेष्ठ शौनक! आप धन्य हैं; आपके हदयमें पुराण-कथा सुननेके प्रति विशेष पेम एवं लालसा है, इसलिये मैं शुद्ध बुद्धसे विचारकर परम उत्तम शास्त्रका वर्णन करता हूाह। वत्स! सम्पूर्ण शा्त्रोके सिद्धा्तसे सम्प्न, भक्ति आदिको बढ़ानेवाले, भगवान् शिवको सन्तुष्ट करनेवाले तथा कानोंके लिये रसायनस्वरूप दिव्य पुराणका श्रवण कीजिये I ७|
यह उत्तम शिवपुराण कालरूपी सर्पसे प्राप्त होनेवाले महान् त्रास का विनाश करनेवाला है। हे मुने! पूर्वकालमें शिवजीने इसे कहा था। गुरुदेव
व्यासजीने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर कलियुगके प्राणियोंके कल्याणके लिये बड़े आदरसे संक्षेपमें इस ९ पुराणका प्रतिपादन किया है।८-९ हे मुने! विशेष रूपसे कलियुगके प्राणियोंकी चित्तशुद्धिकि लिये इस शिवपुराणके अतिरिक्त कोई अन्य साधन नहीं है। १०l हे मुने।! जिस बुद्धिमान् मनुष्यके पूर्वजन्मके बड़े पुण्य होते हैं, उसी महाभाग्यशाली व्यक्तिकी इस पुराणमें प्रीति होती है। १९। यह शिवपुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस भूतलपर भगवान्शिवका वाइ्मय स्वरूप समझना चाहिये और सब प्रकारसे इसका सेवन करना चाहिये॥ १२॥ इसके पठन और श्रवणसे शिवभक्ति पाकर श्रेष्ठतम स्थितिमें पहुँचा हुआ मनुष्य शीषघ्र ही शिवपदको प्राप्त कर लेता है। इसलिये सम्पर्ण यल करके मनुष्योंने इस पुराणके अध्ययनको अभीष्ट साधन माना है और इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी सम्पूर्ण वांछित फलोंको देनेवाला है। १३-१४॥ भगवान् शिवके इस पुराणको सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करके [अन्तमें] शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। १५l। राजसूययज्ञ और सैकड़ों अग्निष्टोमयज्ञोंसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह भगवान् शिवकी कथाके सुननमात्रसे प्राप्त हो जाता है।११६॥ हे मुने।! जो लोग इस श्रेष्ठ शास्त्र शिवपुराणका श्रवण करते हैं, उन्ें मनुष्य नहीं समझना चाहिये; वे रुद्रस्वरूप ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १७॥ इस पुराणका श्रवण और कीर्तन करनेवालोंके चरण- कमलकी धूलिको मुनिगण तीर्थ ही समझते हैं। १८ जो “प्राणी परमपदको प्रा्त करना चाहते हैं, उन्हें सदा भक्तिपूर्वक इस निर्मल शिवपुराणका श्रवण करना चाहिये ॥ १९॥ हे मुनिश्रष्ठ! यदि मनुष्य सदा इसे सुननेमें समर्थं न हो, तो उसे प्रतिदिन स्थिर चित्तसे एक मुहूरत भी इसको सुनना चाहिये। हे मुने! यदि मनुष्य प्रतिदिन सुननेमें भी अशक्त हो, तो उसे किसी पवित्र महीनेमें इस शिवपुराणका श्रवण करना चाहिये ॥ २०-२१
जो लोग एक मुहर्त, उसका आधा, उसका भी आधा अथवा क्षणमात्र भी इस पुराणका श्रवण करते हैं, उनकी दुरगति नहीं होती॥ २२॥
हे मुनीश्वर! जो पुरुष इस शिवपुराणकी कथाको सुनता है, वह सुनेवाला पुरुष कर्मरूपी महावनको जलाकर संसारके पार हो जाता है॥ २३ हे मुने! सभी दानों और सभी यज्ोंे जो पुण्य मिलता है, वह फल भगवान शिवके इस पुराणको सुननेसे निश्चल हो जाता है। २४॥
हे मुने! विशेषकर इस कलिकालमें तो शिवपुराणके श्रवणके अतिरिक्त मनुष्योंके लिये मुक्तिदायक कोई अन्य श्रष्ठ साधन नहीं है। २५॥
शिवपुराणका श्रवण और भगवान् शंकरके नामका संकीर्तन–दोनों ही मनुष्योंको कल्पवृक्षके समान सम्यक् फल देनेवाले हैं, इसमें सन्देह नहीं है। २६॥ कलियुगमें धर्माचरणसे शून्य चित्तवाले दुर्बुद्धि मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् शिवने अमृतरसस्वरूप शिवपुराणकी उद्रावना की है॥ २७
अमृतपान करनेसे तो केवल अमृतपान करनेवाला ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवान् शिवका यह कथामृत सम्ूर्ण कुलको ही अजर-अमर कर देता है॥ २८॥
इस शिवपुराणकी परम पवित्र कथाका विशेष रूपसे सदा ही सेवन करना चाहिये, करना ही चाहिये, करना ही चाहिये। इस शिवपुराणकी कथाके श्रवणका क्या फल कहँ ? इसके श्रवणमात्रसे भगवान् सदाशिव उस प्राणीके हृदयमें विराजमान हो जाते हैं ।l २९-३०l
यह [शिवपुराण नामक] ग्रन्थ चौबीस हजार श्लोकोंसे युक्त है। इसमें सात संहिताएँ हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे भली-भाँति सम्पन्न हो बड़े आदरसे इसका श्रवण करे। ३१॥ पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रु्रसंहिता, तीसरी शतरुद्रसंहिता, चौथी कोटिरुद्रसंहिता और पाँचवीं उमासंहिता कही गयी है; छठी कैलाससंहिता और सातवीं वायवीय-संहिता- इस प्रकार इसमें सात संहिताएँ हैं।॥ ३२-२२॥
सात संहिताओंसे युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्माके समान विराजमान है और सबसे उत्ृषट गति प्रदान करनेवाला है।। ३४Il जो मनुष्य सात संहिताओंवाले “इस शिवपुराणको आदरपूर्वक पूरा पढ़ता है, वह जीवनमुक्त कहा जाता है ॥ ३५ ll हे मुने! जबतक इस उत्तम शिवपुराणको सुननेका सुअवसर नहीं प्राप्त होता, तबतक अज्ञानवश प्राणी इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है॥ २६ ॥ भ्रमित कर देनेवाले अनेक शा्त्ों और पुराणोंके श्रवणसे क्या लाभ है, जबकि एक शिवपुराण ही मुक्ति प्रदान करनेके लिये गर्जन कर रहा है॥ ३७॥ जिस घरमें इस शिवपुराणकी कथा होती है, वह घर तीर्थस्वरूप ही है और उसमें निवास करनेवालोंके पाप यह नष्ट कर देता है। ३८॥ हजारों अश्वमेधयज्ञ और सैकडों .वाजपेययज्ञ शिवपुराणकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते ॥1 ३९ ॥ हे मुनिश्रषठ! कोई अधम प्राणी जबतक भक्तिपूर्वक शिवपुराणका श्रवण नहीं करता, तभीतक उसे पापी कहा जा सकता है । ४०l गंगा आदि पवित्र नदियाँ, [मुक्तिदािनी] सप्त पुरियाँ तथा गयादि तीर्थ इस शिवपुराणकी समता कभी नहीं कर सकते॥| ४१॥ जिसे परमगतिकी कामना हो, उसे नित्य शिवपुराणके एक श्लोक अथवा आधे श्लोकका ही स्वयं भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये। ४२l जो निरन्तर अर्थानुसन्धानपूर्वक इस शिवपुराणको बाँचता है अथवा नित्य प्रेमपूर्वक इसका पाठमात्र करता है, वह पुण्यात्मा है, इसमें संशय नहीं है।l ४३Il जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष अन्तकालमें भक्तिपरव्वक इस पुराणको सुनता है, उसपर अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् महेश्वर उसे अपना पद (धाम) प्रदान करते hain जो प्रतिदिन आदरपूर्वक इस शिवपुराणका पूजन करता है, वह इस संसारमें सम्मूरण भोगोंको भोगकर अन्तमें भगवान् शिवके पदको प्राप्त कर लेता है।| ४५
जो प्रतिदिन आलस्यरहित हो रेशमी वस्त्र आदिके वेष्टनसे इस शिवपुराणका सत्कार करता है वह सदा सुखी होता है। ॥ यह शिवपुराण निर्मल तथा शैवंका सर्वस्व है, इहलोक और परलोकमें सुख चाहनेवालेको आदरके साथ प्रयत्नपूवंक इसका सेवन करना चाहिये।I ४७ यह निर्मल एवं उत्तम शिवपुराण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है, अतः सदा प्रेमपूर्वक इसका श्रवण एवं विशेष रूपसे पाठ करना चाहिये I| ४८ ll वेद, इतिहास तथा अन्य शास्त्रोें यह शिवपुराण विशेष कल्याणकारी है– ऐसा मुमु्ुजनोंको समझना चाहिये ।1 ४९ यह शिवपुराण आत्मत्तवज्ञोंके लिये सदा सेवनीय है, सत्पुरुषोंके लिये पूजनीय है, तीनों प्रकारके तापोंका शमन करनेवाला है, सुख प्रदान करनेवाला है तथा ब्रह्मा-विष्णु-महेशादि देवताओंको प्राणोंके समान प्रिय है। ५० I ऐसे शिवपुराणको मैं प्रस्नचित्तसे सदा वन्दन करता हँ। भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों और अपने चरणकमलोंकी भक्ति मुझे प्रदान करें। ५१।