नैमिषारण्य में सूतजी का आगमन, ‘पुराण का आरम्भ तथा सृष्टि का वर्णन

पूर्वकाल की बात है, परम पुण्यमय पवित्र नैमिषारण्य क्षेत्र बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वहाँ बहुत-से मुनि एकत्रित हुए थे, भाँति-भाँति के पुष्प उस स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे। पीपल, पारिजात, चन्दन, अगर, गुलाब तथा चम्पा आदि अन्य बहुत-से वृक्ष उसकी शोभा वृद्धि में सहायक हो रहे थे। भाँति-भाँति के पक्षी, नाना प्रकार के मृगों का झुंड, अनेक पवित्र जलाशय तथा बहुत-सी बावलियाँ उस वन को विभूषित कर रही थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जाति के लोग भी वहाँ उपस्थित थे। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी- सभी जुटे हुए थे। झुंड-की-झुंड गौएँ उस वन की शोभा बढ़ा रही थीं। नैमिषारण्य वासी मुनियों का द्वादश वार्षिक (बारह वर्षो तक चालू रहने वाला) यज्ञ आरम्भ था। जौ,गेहूँ, चना, उड़द, मूँग और तिल आदि पवित्र अन्नों से यज्ञ मण्डप सुशोभित था। वहाँ होमकुण्ड में अग्नि देव प्रज्वलित थे और आहुतियाँ डाली जा रही थीं। उस महायज्ञ में सम्मिलित होने के लिये बहुत-से मुनि और ब्राह्मण अन्य स्थानों से आये। स्थानीय महर्षियों ने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया। ऋत्विजों सहित वे सब लोग जब आराम से बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् लोमहर्षण सूतजी वहाँ पधारे। उन्हें देखकर मुनिवरों को बड़ी प्रसन्नता हुई, उन सबने उनका यथावत् सत्कार किया। सूतजी भी उनके प्रति आदरका भाव प्रकट करके एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। उस समय सब ब्राह्मण सूतजी के साथ वार्तालाप करने लगे। बातचीत के अन्त में सबने व्यास-शिष्य लोमहर्षण जी से अपना संदेह पूछा। मुनि बोले – साधुशिरोमणे! आप पुराण, तन्त्र, छहों शास्त्र, इतिहास तथा देवताओं और दैत्योंके जन्म-कर्म एवं चरित्र- सब जानते हैं। वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा मोक्षशास्त्रमें कोई भी बात ऐसी नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो। महामते ! आप सर्वज्ञ हैं, अतः हम आपसे कुछ प्रश्नोंका उत्तर सुनना चाहते हैं; बताइये, यह समस्त जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? भविष्यमें इसकी क्या दशा होगी ? स्थावर-जङ्गमरूप संसार सृष्टिसे पहले कहाँ लीन था और फिर कहाँ लीन होगा?

लोमहर्षण जी ने कहा- जो निर्विकार, शुद्ध, नित्य, परमात्मा, सदा एकरूप और सर्वविजयी हैं, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप से जगत्‌ की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाले हैं तथा जो भक्तों को संसार-सागर से तारने वाले हैं, उन भगवान्‌ को प्रणाम है। जो एक होकर भी अनेक रूप धारण करते हैं, स्थूल और सूक्ष्म सब जिनके ही स्वरूप हैं, जो अव्यक्त (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप तथा मोक्ष के हेतु हैं, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो जगत्‌ की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाले हैं, जरा और मृत्यु जिनका स्पर्श नहीं करतीं, जो सबके मूल कारण हैं, उन परमात्मा विष्णु को नमस्कार है। जो इस विश्व के आधार हैं, अत्यन्त सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं, सब प्राणियों के भीतर विराजमान हैं, क्षर और अक्षर पुरुषसे उत्तम तथा अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णु को प्रणाम करता हूँ। जो वास्तव में अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थों के रूप में प्रतीत हो रहे हैं, जो विश्व की सृष्टि और पालन में समर्थ एवं उसका संहार करने वाले हैं, सर्वज्ञ हैं, जगत् के अधीश्वर हैं, जिनके जन्म और विनाश नहीं होते, जो अव्यय, आदि, अत्यन्त सूक्ष्म तथा विश्वेश्वर हैं, उन श्रीहरि को तथा ब्रह्मा आदि देवताओं को मैं प्रणाम करता हूँ। तत्पश्चात् इतिहास-पुराणों के ज्ञाता, वेद वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ पराशर नन्दन भगवान् व्यास को, जो मेरे गुरुदेव हैं, प्रणाम करके मैं वेद के तुल्य माननीय पुराण का वर्णन करूँगा। पूर्वकाल में दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियों के पूछने पर कमल योनि भगवान् ब्रह्माजी ने जो सुनायी थी, वही पाप नाशिनी कथा मैं इस समय कहूँगा। मेरी वह कथा बहुत ही विचित्र और अनेक अर्थोवाली होगी। उसमें श्रुतियों के अर्थ का विस्तार होगा। जो इस कथा को सदा अपने हृदय में धारण करेगा अथवा निरन्तर सुनेगा, वह अपनी वंश-परम्परा को कायम रखते हुए स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित होगा।

जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारण भूत अव्यक्त प्रकृति है, उसी को प्रधान कहते हैं। उसी से पुरुष ने इस विश्व का निर्माण किया है। मुनिवरो ! अमित तेजस्वी ब्रह्माजी को ही पुरुष समझो। वे समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले तथा भगवान् नारायण के आश्रित हैं। प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहङ्कार तथा अहङ्कार से सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतों के जो भेद हैं, वे भी उन सूक्ष्म भूतों से ही प्रकट हुए हैं। यह सनातन सर्ग है। तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सबसे पहले जल की ही सृष्टि की। फिर जल में अपनी शक्ति का आधान किया। जल का दूसरा नाम ‘नार’ है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नर से हुई है। वह जल पूर्वकाल में भगवान्‌ का अयन (निवास स्थान) हुआ, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। भगवान् ने जो जल में अपनी शक्ति का आधान किया, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ। उसी में स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए-ऐसा सुना जाता है। सुवर्ण के समान कान्तिमान् भगवान् ब्रह्मा ने एक वर्षतक उस अण्डमें निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़े से द्युलोक बनाया और दूसरे से भूलोक। उन दोनों के बीचमें आकाश रखा। जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं। साथ ही काल, मन, वाणी, काम, क्रोध और रति की सृष्टि की। इन भावों के अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा से ब्रह्माजी ने सात प्रजापतियों को अपने मन से उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं- मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ। पुराणों में ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं।

तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने अपने रोष से रुद्र को प्रकट किया। फिर पूर्वजों के भी पूर्वज सनत्कुमार जी को उत्पन्न किया। इन्हीं सात महर्षियों से समस्त प्रजा तथा ग्यारह रुद्रों का प्रादुर्भाव हुआ। उक्त सात महर्षियों के सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं, देवता भी इन्हीं के अन्तर्गत हैं। उक्त सातों वंशों के लोग कर्मनिष्ठ एवं संतानवान् हैं। उन वंशों को बड़े-बड़े ऋषियों ने सुशोभित किया है। इसके बाद ब्रह्माजी ने विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित, इन्द्रधनुष, पक्षी तथा मेघों की सृष्टि की। फिर यज्ञों की सिद्धि के लिये उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद प्रकट किये। तदनन्तर साध्य देवताओं की उत्पत्ति बतायी जाती है। छोटे-बड़े सभी भूत भगवान् ब्रह्मा के अङ्गोंसे उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार प्रजा की सृष्टि करते रहने पर भी जब प्रजा की वृद्धि नहीं हुई, तब प्रजापति अपने शरीर के दो भाग करके आधे से पुरुष और आधे से स्त्री हो गये। पुरुष का नाम मनु हुआ। उन्हीं के नामपर ‘मन्वन्तर’ काल माना गया है। स्त्री अयोनिजा शतरूपा थी, जो मनु को पत्नी रूप में प्राप्त हुई। उसने दस हजार वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके परम तेजस्वी पुरुषको पति रूप में प्राप्त किया। वे ही पुरुष स्वायम्भुव मनु कहे गये हैं (वैराज पुरुष भी उन्हीं का नाम है)। उनका ‘मन्वन्तर-काल’ इकहत्तर चतुर्युगी का बताया जाता है। शतरूपा ने वैराज पुरुष के अंश से वीर, प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र उत्पन्न किये। वीर से काम्या नामक श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न हुई जो कर्दम प्रजापति की धर्मपत्नी हुई। काम्या के गर्भसे चार पुत्र हुए-सम्राट्, कुक्षि, विराट् और प्रभु। प्रजापति अत्रि ने राजा उत्तानपाद को गोद ले लिया। प्रजापति उत्तानपाद ने अपनी पत्नी सूनृता के गर्भसे ध्रुव, कीर्तिमान् आयुष्मान् तथा वसु-ये चार पुत्र उत्पन्न किये। ध्रुव से उनकी पत्नी शम्भु ने शिलष्टि और भव्य-इन दो पुत्रों को जन्म दिया। शिलष्टि को उसकी पत्नी सुछाया के गर्भ से रिपु, रिपुञ्जय, वीर, वृकल और वृकतेजा-ये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। रिपु से बृहती ने चक्षुष् नाम के तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। चक्षुष्‌ को उनकी पत्नी पुष्करिणी से, जो महात्मा प्रजापति वीरण की कन्या थी, चाक्षुष् मनु उत्पन्न हुए। चाक्षुष मनु से वैराज प्रजापति की कन्या नड्वला के गर्भ से दस महाबली पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं- कुत्स, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र,सुद्युम्न तथा अभिमन्यु। पुरु से आग्नेयी ने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा तथा मय । ये छः पुत्र उत्पन्न किये। अङ्ग से सुनीथा ने वेन नामक एक पुत्र पैदा किया। वेन के अत्याचार से ऋषियों को बड़ा क्रोध हुआ; अतः प्रजा जनों की रक्षा के लिये उन्होंने उसके दाहिने हाथ का मन्थन किया, उससे महाराज पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियों ने कहा- ‘ये महातेजस्वी नरेश प्रजा को प्रसन्न रखेंगे तथा महान् यश के भागी होंगे।’ वेनकुमार पृथु धनुष और कवच धारण किये अग्निके समान तेजस्वी रूप में प्रकट हुए थे। उन्होंने इस पृथ्वी का पालन किया। राजसूय यज्ञ के लिये अभिषिक्त होनेवाले राजाओं में वे सर्व प्रथम थे। उनसे ही स्तुति-गान में निपुण सूत और मागध प्रकट हुए। उन्होंने इस पृथ्वीसे सब प्रकारके अनाज दुहे थे। प्रजा की जीविका चले, इसी उद्देश्य से उन्होंने देवताओं, ऋषियों, पितरों, दानवों, गन्धर्वों तथा अप्सराओं आदि के साथ पृथ्वीका दोहन किया था।

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